Kalki Kavach
श्रीहरि:
श्री नारायण कवचम्
राजोवाच
यया गुप्त: सहस्राक्ष: सवाहन् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रयम् ।। 1 ।।
भगवंस्तन्ममाख्याहि धर्म नारायणात्मकम्।
यथाऽऽततायिन: शत्रून येन गुप्तोऽजयन्मृधे ।। 2 ।।
राजा परीक्षित ने पूछा — हे भगवान् ! देवराज इन्द्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरगिनी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीत कर त्रिलोकी की राजलक्ष्मी का उपभोग किया, आज उस नारायण कवच को मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। 1-2 ।
वत: पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रयानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमना: शृणु ।। 3 ।।
श्री शुकदेव जी ने कहा — परीक्षित्! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने उन्हें नारायण कवच का उपदेश किया। तुम एकाग्रचित से उसका श्रवण करो । 2 ।
विश्वरूप उवाच
घोताड.घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदड.मुख:।
कृतस्वांगकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यत: शुचि ।। 4 ।।
नारायणमयं वर्म संनह्योद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोंदरे ह्यद्यथोरसि ।। 5 ।।
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ।। 6 ।।
विश्वरूप ने कहा — देवराज इन्द्र! भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए। उसकी विधि यह है कि पहले हाथ पैर धोकर आचमन करें, फिर हाथ में कुश की पवित्री धारण कर उत्तर को मुँह करके बैठ जाय। इसके बाद कवच धारण पर्यन्त और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से — ‘ॐ नमो नारायणय’ और – ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ – इन मन्त्रों के द्वारा हृदयादि अगन्यास तथा अंगुष्ठादि कर न्यास करे। पहले ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्ठाक्षर मंत्र के ॐ आदि आठ अक्षरों का क्रमश: पैरों, घुटनों, जांघों, पेट, हृदय, वक्ष-स्थल, मुख और सिर में न्यास करे। अथवा पूर्वोक्त मंत्र के यकार से लेकर ॐ कार्र पर्यन्त आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ करके उन्हीं आठ अंगों में विपरीत क्रम से न्यायय करें। 4-6 ।
करन्यासं तत कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारान्तमुगुल्यंगुष्ठपर्वसु ।। 7 ।।
तदनन्तर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ – इस द्वादशाक्षर मंत्र के ॐ आदि बारह अक्षरों का दायीं तर्जनी से बांयी तर्जनी तक दोनों हाथ की आठ अंगुलियों और दोनों अंगूठों की दो-दो गांठों में न्यास करे । 7 ।
न्यसेद्हृदय ओंकारं विकारमनु मूर्धनि ।
शकारं तु भ्रुवोर्मध्ये ण्कारं शिखया दिशेत् ।। 8 ।।
वेकारं नेत्रयुर्युज्जयान्नकारं सर्वसंधिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भयेद बुध: ।। 9 ।।
ॐ विष्णवे नम इति ।। 10 ।।
फिर ‘ॐ विष्णवे नम:’ इस मंत्र के पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र में, ‘ष’ का भौहों बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’ का दोनों नेत्रों में और ‘न’ का शरीर की सब गांठों में न्यास करें। तदन्तर ‘ॐ म: अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करें। इस प्रकार न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरुष मन्त्र स्वरूप हो जाता है । 8-10 ।
आत्मानं परमं ध्यायेद् ध्येयं ष्ट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिंमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ।। 11 ।।
इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान् का ध्यान करें और अपने को भी तद्रूप ही चिन्तन करे। तत्पश्चात् विद्या, तेज और तब: स्वरूप इस कवच का पाठ करे ।। 11 ।।
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताड.घ्रिपद्म: पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-पाशान् दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहु: ।। 12 ।।
भगवान् श्रीहरि गरुड़ जी की पीठ पर अपने चरण-कमल रखे हुए हैं। अणिमादि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। आठ हाथों में शेख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश (फंदा) धारण किये हुए हैं। वे ही ॐ कार स्वरूप प्रभु सब प्राकर से सब ओर से मेरी रक्षा करें ।। 12 ।।
जलेषु मां रक्षतु मत्सयमूर्तिर्या-दोर्गणेभ्यो वरुणस्य पाशात्।
स्थलषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रम: खेऽवतु विश्वरूप:।। 13 ।।
मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जल-जन्तुओं से और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करें। माया से ब्रह्मचारी का रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रम भगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें । 13 ।
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभु: पायान्नृसिंहोऽवतु विश्वरूप: ।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भा: ।। 14 ।।
जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएं गूंज उठी थीं और गर्भवती दैत्य-पत्नियों के गर्भ गिर गए थे, वे दैत्ययूथ पतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें। 14 ।
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्प: स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराह:।
रामोऽद्रिकूटेषवथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद् भरताग्रजोऽस्मान् ।।15।।
अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों पर और लक्ष्मण जी के सहित भरत के बड़े भाई भगवान् रामचन्द्र प्रवाह के समय मेरी रक्षा करें ।15।
मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादा-न्नाराण: पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथ: पायाद् गुणेश: कनिल: कर्मबन्धात् ।।16।।
भगवान् नारायण मारण-मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें। ऋषि श्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्म-बन्धनों से मेरी रक्षा करें। 16 ।
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्य: पुरुषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।। 17 ।।
परमर्षि सनत्कुमार से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देव-मूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें। 17 ।
धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादेवताज्जानान्ताद् बलो गणत् क्रोधवशादहीन्द्र: ।। 18 ।।
भगवान् धनवन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्रिय भगवान् ऋषभदेव सुख-दुख आदि भयानक द्वन्दों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और शेषजी के क्रोधवशनामक सर्पों के गण से मेरी रक्षा करें । 18 ।
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्कि: कले: कालमलातड. प्रपातु धर्मावनायोरुकृतावतार: ।। 19 ।।
भगवान् श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें। धर्म-रक्षा के लिए महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें। 19 ।
मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्ग वमात्तवेणु:।
नारायण: प्राण्ह उदात्तशक्ति-र्मध्यंदिने विष्णुररीन्द्रपाणि: ।। 20 ।।
प्रात: काल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें । 20 ।
देवोऽपराह्ने मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिमावतु माधवो माम्।
दोषी हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभ:।। 21 ।।
तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें। सायंकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषीकेश, अर्द्धरात्रि के पूर्व तथा अर्द्धरात्रि समय अकेले भगवान् पद्मानाभ मेरी रक्षा करें। 21 ।
श्रीवत्सधामापररात्र ईश:। प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दन:।
दामोदरोऽव्यादनुसंध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्ति:।। 22 ।।
रात्रि के पिछले पहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्री दामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें। 22 ।।
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दंदग्धि दंदग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताश:।। 23 ।।
सुदर्शन! आपका आकार चक्र (रथ के पहिये) की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलय कालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं। जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रु सेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिए, जला दीजिए। 23 ।
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिंगे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढय्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन्।। 24 ।।
कौमोदकी गदा! आपसे छूटने वाली चिंगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है। आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ। इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिए, कुचल डालिए तथा मेरे शत्रुओं को चूर-चूर कर दीजिए। 24 ।
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ-पिशाचविप्रग्रहवोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन्।। 25 ।।
शंख श्रेष्ठ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूंकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिए एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहां से झटपट भगा दीजिए। 25 ।
त्वं तिग्मधरासिवरारिसैन्य-मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि-छिन्धि।
चक्षूँषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम्।। 26 ।।
भगवान् की श्रेष्ठ तलवार! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है। आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-छिन्न कर दीजिए। भगवान् की प्यारी ढाल! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं। आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आंखें बंद कर दीजिए और उन्हें सदा के लिए अन्धा बना दीजिए। 26 ।
यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योऽहोभ्य एवं वा।। 27 ।।
सर्वाण्येतानि भगवान्नमरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये न: श्रेय: प्रतीपका:।। 28 ।।
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु दाढ़ों वाले हिंसक पशु, भूतप्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो-जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों-वे सभी भगवान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जाए। 27-28 ।
गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमय: प्रभु।
रक्षत्वशेषकृच्छेभ्यो विषवक्सेन: स्वनामभि:।। 29 ।।
बाहद, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरुड़ और विषवक्सेन जी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचाए। 29 ।
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि न:।
बुद्धीन्द्रियमन: प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणा:।। 30 ।।
श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचाए। 30 ।
यथ हि भगवानेव वस्तुत: सदसच्च यत्।
सत्येनानेन न: सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवा:।। 31 ।।
जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है-इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जाएं। 31 ।
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहित: स्वयम्।
भूषणायुधलिंगाख्या धत्ते शक्ति: स्वमायमा।। 32 ।।
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरि:।
पातु सर्वै: स्वरूपैर्न: सदा सर्वत्र सर्वग:।। 33 ।।
जो लोग ब्रह्मा और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों –भेदों से रहित है, फिर भी वे अपनी माया-शक्ति के द्वारा भषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं। यह बात निश्चित रूप से सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्री हरि सदा-सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें। 32-33 ।
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमध: समन्तादन्त-बहिर्भगवान् नरसिंह:।
प्रहापयंल्लोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजा:।। 34 ।।
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा-विदिशा में, नीचे-ऊपर, बाहर-भीतर सब ओर हमारी रक्षा करें। 34 ।
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसूरयूथपान्।। 35 ।।
देवराज इन्द्र ! मैंने तुम्हें यह नारायण कवच सुना दिया। इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो। बस, फिर तुम अनायास ही सब देत्य-यूथपतियों को जीत लोगे। 35 ।
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्चति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्य: साध्वसात् व विमुच्यते।। 36 ।।
इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरुष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता अथवा पैर से छू देता है, वह तत्काल समस्त भयों से मुक्त हो जाता है।36।
न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रा-दिभ्यश्च कर्हिचित्।। 37 ।।
जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाचादि और बाघ आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय नहीं होता। 37 ।
इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विज:।
योगधारणया स्वांग जहौ स मरुधन्वति।। 38 ।।
देवराज! प्राचीन काल की बात है, एक कौशिक गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारण से अपना शरीर मरुभूमि में त्याग दिया।38।
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथ: स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षय:।। 39 ।।
जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके ऊपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठकर निकले।39।
गगनान्यपतत् सद्य: सविमानो ह्यवाक्शिरा:।
स बालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मित:।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा।
धाम स्वमन्वगात्।। 40 ।।
वहाँ आते ही वे नीचे की ओर किए विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े। इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही। जब उन्हें बालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देवता की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को आ गए।40।
श्री शंक उवाच
य इदं श्रृणुयात् काले यो धारयति चादृत:।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात्।। 41 ।
श्री शुकदेव जी कहते हैं — परीक्षित! जो पुरुष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर-पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है।41।
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतु:।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान्।। 42 ।।
परीक्षित! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूप जी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्य लक्ष्मी का उपभोग करने लगे।42।