Goal
क्यों नहीं इस कलियुग में कल्कि का कुछ काम करें,
इस कर्मभूमि पर कर्मयोनि में कल्कि का गुणगान करें।
कर्मभूमि भारत में आपका जन्म, आपके सौभाग्य की गाथा गाता है, क्योंकि भारत व भारत की संस्कृति सबसे विशाल व प्राचीन है। और इससे भी बड़ी बात कि भारतवर्ष की भूमि नारायण श्री हरि का घर है। जहाँ से वो पूरी पृथ्वी का संचालन करते हैं। इस कलियुग में भगवान महाविष्णु का अंतिम अवतार ही होना शेष है। भगवान श्री कल्कि के पुकार व प्रचार हेतु हम सदैव प्रतिबद्ध व कटिबद्ध हैं। यह दुर्लभ कार्य सभी मनुष्य योनि में उत्पन्न हुए प्राणियों के लिए नहीं है। इस कार्य हेतु बड़े-बड़े ऋषि मुनि, योगीजन, देवतागण पृथ्वी पर जन्म ले चुके हैं व जन्म ले रहे हैं।
हम तो उनके लिए एक छोटा सा मंच बना रहे हैं जिससे कि वे माया के चक्रव्युह में फंस कर जो अपना बहुमूल्य समय गंवा रहे हैं उनको जान पाये, जिस मुख्य उद्देश्य के लिए उन्होंने जन्म लिया था, उसका आभास उन्हें हो सके। जैसे कि जामवन्त जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का आभास करा कर उन्हें जागृत किया जिससे वे समुद्र पार कर लंका पहुँचे। वैसे ही हमारा लक्ष्य उन सभी देवी देवताओं ऋषि मुनियों को जागृत करने का है जो इस पृथ्वी पर जन्म लेकर आये हैं।
किसी की सौ बार गरज पड़े तो कल्कि-कल्कि करें वरना जो मन भाये वो करें
कलियुग अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है, परन्तु आज मनुष्य इस सच को मानना नहीं चाहता और किन्तु परन्तु जोड़ देता है, क्योंकि उसकी आँखों पर भौतिकता का पर्दा पड़ा हुआ है तथा वह सब कुछ जानते हुए भ्रम में जीना चाहता है।
आज हम अपने गुरूदेव हनुमान जी महाराज व रामकृष्ण परमहंस जी महाराज के आर्शीवाद से कलियुग की चालों को समझ पाये कि कितनी चतुराई से उसने हमारे गुरूकुल बंद करवाये जहाँ पर आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती थी, ब्रह्मणों के लिए अविश्वास बढ़ाया और गौ धन नष्ट किया। स्कूलों व युनिवर्सिटीज की नींव रखी गई जहाँ पर पाश्चात्य संस्कृति भोगविलासों के सभी मार्ग समझाये व पढ़ाये गये। जिसके कारण हमारी युवा पीढ़ी प्राचीन भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म पुराणों और ब्राह्मणों को हीन भावना से देखते हैं, और तर्क वितर्क करते हैं, मजाक उड़ाते हैं क्योंकि हमारी युवा पीढ़ी का आध्यात्मिक ज्ञान शून्य है। आप सभी को मालूम ही है कि भारत की जड़ें नवपीढ़ी व बच्चों में ही हैं जब वह पीढ़ी भोगविलासों व पाश्चात्य संस्कृति, सनातन धर्म, हिन्दुत्व यह सब डोडो पक्षी की तरह लुप्त प्रजाति में पाया जायेगा। हमने आज की नवपीढ़ी के लिए संस्कार शिविरों द्वारा खेल-खेल में आध्यात्मिक शिक्षा का महत्त्व समझाया है व जागरूकता उत्पन्न की है जिससे हमारा हर बच्चा भविष्य में विवेकानन्द निकले और अपना सफलतापूर्वक जीवन यापन करते हुए कल्कि भगवान के प्राकट्य के लिए पुकार व प्रचार प्रसार करे जिससे सम्पूर्ण दैवीय जगत, पृथ्वी, भारतवर्ष का उद्धार हो सके।
आप सिर्फ आत्ममंथन कीजिए इसके अतिरिक्त कुछ ना कीजिए
जय श्री कल्कि