Ganesh Kavach

🧘 Category: Kavach 📅 04/12/14

  विघ्‍नविनाशक श्री गणेश कवचम्  

मुनि उवाच

ध्‍यायेत् सिंहगतं विनायकममुदिग्‍बाहुमाधे युगे,
त्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षडबाहुकं सिद्धिदम् ।।1।।

द्वापरके तु गजाननं युगभुजं रक्‍तांग रागं विभुँ
तुर्ये तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ।।2।।

सतयुग में सिंह पर सवार आठ हाथ वाले विनायक का ध्‍यान करें। त्रेतायुग में सिद्धिदायक, छ: हाथ वाले, मयूर पर सवार गणेश का ध्‍यान करें। द्वापर में चार हाथ वाले गणपति लाल अंगराग की जैसी कांति वाले तथा कलियुग में दो हाथ वाले श्‍वेतांग जो सर्वदा सर्वकार्य पूर्ण करते हैं ऐसे गणेशजी का ध्‍यान करें।

                    विनायक: शिखां पातु परमात्‍मा परारत्‍पर:,
                    अति सुन्‍दरकायस्‍तु मस्‍तकं सुमहोत्‍कट: ।।3।।

परात्‍पर परमात्‍मा विनायक चोटी की रक्षा करें, अधिक सुन्‍दर शरीर वाले सुमहोत्‍कट मस्‍तक की रक्षा करें।

                    ललाटं कश्‍यप: पातु भ्रूयुगं तु महोदर:,
                    नयने भाल चंद्रस्‍तु गजास्‍यस्‍त्‍वोष्‍ठपल्‍लवौ ।।4।।

ललाट की कश्‍यप, भौहों की महोदर, आँखों की भालचन्‍द्र और दोनों होठों की रक्षा गजमुख करें।

                    जिह्वां पातु गणाक्रीडश्चिबुकं गिरिजासुत:,
                    वाचं विनायक: पातु दंतान् रक्षतु दुर्मुख ।। 5 ।।

जिह्वा की रक्षा गणक्रीड, चिबुक की रक्षा गिरिजा नन्‍दन, वाणी की रक्षा विनायक और दाँतों की रक्षा दुर्मुख करें।

                    श्रवणौ पाशुपाणिस्‍तु नासिकां चिंतितार्थद:,
                    गणेशस्‍तु मुखं कंठं पातु देवो गणञ्जय: ।। 6 ।।

पाशपाणि दोनों हाथ की, इच्छित फल देने वाले नाक की, गणेश मुख की, गणों को जीतने वाले देव कंठ की रक्षा करें।

                    स्‍कन्‍धौ पातु गजस्‍कन्‍ध: स्‍तनौ विघ्‍नविनाशन:,
                    हृदयं गणनाथस्‍तु हेरंबो जठरं महान् ।।7।।

दोनों कंधों की रक्षा गज स्‍कन्‍ध, स्‍तनों की विघ्‍न-विनाशक, हृदय की गणनाथ और हेरंब पेट की रक्षा करें।

                    धराधर: पातु पार्श्‍वो पृष्‍ठं विघ्‍नहर: शुभ:,
                    लिंगं गुह्यं सदा पातु कव्रतुण्‍डो महाबल: ।।8।।

दोनों पार्श्‍व भाग की धराधर, पीन की विघ्‍नहर और लिंग एवं गुह्य की रक्षा महाबली वक्रतुण्‍ड करें।

                    मणक्रीडो जानु जंघे उरु मड्गलमूर्तिमान्,
                    एकदन्‍तो महाबुद्धि: पादौ गुल्‍फौ सदावतु ।।9।।

घुटनों तथा जंघाओं की रक्षा गणों से खेलने वाले करें, नितम्‍बर की मंगलमूर्ति, पैर और गुल्‍फ की रक्षा महाबुद्धि वाले एकदन्‍त करें।

                    क्षिप्रप्रसादनों बाहू पाणी आशाप्रपूरक:,
                    अंगुलीश्‍च नखान्‍पातु पद्य हस्‍तोरिनाशन: ।। 10 ।।

बाहु की रक्षा शीघ्र प्रसन्‍ना, हाथों की रक्षा आशा पूरक करें, अंगुली तथा नाखुनों की रक्षा हाथ में कमल धारक शत्रुनाशक करें।

                    सर्वाड्गाणि मयूरेशो विश्‍वव्‍यापी सदावतु,
                    अनुक्‍तमपि यत्‍स्‍थानं धूम्रकेतु: सदावतु: ।। 11 ।।

सम्‍पूर्ण अंगों की रक्षा विश्‍वव्‍यापी मयरेश करें। अकथति स्‍थानों की रक्षा धूम्रकेतु करें।

                    आमोदस्‍त्‍वग्रत: पातु प्रमोद: पृष्‍छतोऽवतु,
                    प्राच्‍यां रक्षतु बुद्धिश आग्‍नेयां सिद्धिदायक: ।। 12 ।।

आगे आमोद, पीछे प्रमोद, पूर्व में बुद्धीश आग्‍नेय में सिद्धिदायक रक्षा करें।

                    दक्षिणस्‍यामुमापुत्रो नैऋत्‍यां तु गणेश्‍वर:,
                    प्रतीच्‍यां विघ्‍नहर्ताऽव्‍याद्वायव्‍यां गजकर्णक: ।। 13 ।।

दक्षिण की उमा पुत्र, नेऋत्‍य में गणेश्‍वर, पश्चिम में विघ्‍नहर्ता तथा वायव्‍य में गज कर्णक रक्षा करें।

                    कौंबेर्या निधिप: पायादीशान्‍यामीशनन्‍दन:,
                    दिवोऽव्‍यादेकदन्‍तस्‍तु रात्रो संध्‍यासु विघ्‍नह्त्रत् ।। 14 ।।

उत्‍तर में निधिप, ईशान में ईशनन्‍दन, दिन में एकदन्‍त रात्रि में तथा संध्‍याओं में विघ्‍नहर्ता रक्षा करें।

                    राक्षसासुर वेताल ग्रह भूत पिशाचत:,
                    पाशांकुशधर: पातु रज: सत्‍वतम: स्‍मृती: ।। 15 ।।

राक्षस, असुर, बेताल, ग्रह, भूत, पिशाच से पाशांकुश धारण करने वाले, रजोगुण, सतोगुण तथा तमोगुण से युक्‍त रक्षा करें।

                    ज्ञानं धर्म च लक्ष्‍मीं चलज्‍जा कीर्ति तथा कुलम,
                    वपुर्धनं च धान्‍यं च गृह दारान्‍सुतान्‍सखीन् ।। 16 ।।

ज्ञान, धर्म, लक्ष्‍मी, लज्‍जा, कीर्ति, कुल, शरीर, धन, धान्‍य, घर, पत्‍नी, पुत्र और मित्र की रक्षा ...।

                    सर्वायुधधर: क्षेत्रं मयूरेशोऽवतात्‍सदा,
                    कपिलोऽजाविकं पातु गजाश्‍वान् विकटोवतु ।। 17 ।।

सर्वायुध करें-खेत की रक्षा सदैव मयरेश करें। बकरी तथा भेड़ की रक्षा कपिल करें, हाथी तथा घोड़े की रक्षा विकट करें।

                    भूर्जपत्रे लिखित्‍वेदं य: कण्‍ठे धारयेत्‍सुधी:,
                    न भयं जायते तस्‍य यक्ष रक्ष: विशाचत: ।। 18 ।।

इस कवच को भोजपत्र में लिखकर जो बुद्धिमान कंठ में धारण करता है, उसको यक्ष, राक्षस तथा पिशाच का कभी भय नहीं होगा।

                    त्रिसन्‍ध्‍यं जपते यस्‍तु वज्रसार तनुर्भवेत्,
                    यात्रा काले पठेद्यस्‍तु निर्विध्‍नेन फलं लेभेत् ।। 19 ।।

इस कवच को जो कोई तीनों संध्‍याओं में पढ़ता है, उसका शरीर वज्रवत कठोर हो जाता है। यात्रा काल में पढ़ें, तो कार्य निर्विघ्‍न सफल होता है।

                    युद्धकाले पठेद्यन्‍यु विजयं चाप्‍नुयाद ध्रुवम्,
                    मारणोच्‍चाटनाकर्ष स्‍तम्‍भ मोहन कर्मणि ।।20।।

युद्ध काल में पढ़ने पर अवष्‍य विजय प्राप्‍त होती है, मारण उच्‍चाटन, आकर्षण, स्‍तम्‍भन, मोहन आदि कर्म में।

                    सप्‍तवारं जपेदेतद्दिनानामेक विंशतिम्,
                    तत्‍तत्‍फल मवाप्‍नोति साधको नात्र संशय: ।।21।।

7 बार 21 दिन तक जपने से उर्पयुक्‍त फल साधक को प्राप्‍त होता है, इसमें कोई सन्‍देह नहीं है।

                    एकविंशतिवारं च पठेंत्‍तावद्दिनानि य:,
                    कारागृह गतं सद्यो राज्ञवध्‍यं च मोचयेत् ।।22।।

इसे 21 दिनों में 21 बार जो पढ़ता है, वह जेल के बन्‍धन से छूट जाता है।

                    राजा दर्शन वेलायां पठेदेत त्रिवारत:,
                    स राजानं वशं नीत्‍वा प्रकृतिच्च सभां जयेत् ।।23।।

राजा दर्शन के समय में तीन बार पढ़ने से राजा वश में हो जाता है और पाठक सभा जीत जाता है।

                    इदं णेश कवचं कश्‍यपेनसमीरितम्,
                    मृद्गलाय च त्रैनाथ माण्‍डव्‍याय महर्षिये ।।24।।

यह गणेश कवच कश्‍यप ने मुद्गल को बताया था मुद्गल ने महर्षि माण्‍डव्‍य को बताया था।

                    मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम्,
                    न देयं भक्ति हीनाय दयं श्रद्धावते शुभत् ।।25।।

कृपा वश मैंने सर्व सिद्धि देने वाले कवच को बताया है। यह पापी को न देना चाहिए। श्रद्धावान को ही बताएं।

                    अनेनास्‍य कृता रक्षा न बाधाऽस्‍य भवेत्‍क्‍वचित्,
                    राक्षसा सुरवेताल दैत्‍य दानव सम्‍भवा ।। 26 ।।

इस कवच से जो रक्षित रहता है उसे राक्षस, असुर, बेताल, दैत्‍य, दानव से उत्‍पन्‍न किसी प्रकार की बाधा प्राप्‍त नहीं होती है।

 

इति गणेश कवच

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